कैसे मिलती है भारतीय नागरिकता , कैसी होती है खत्म नागरिकता अधिकारों का गट्ठर है, जो व्यक्ति और राज्य के बीच संबंधों को परिभाषित करती है। भारत में मौलिक अधिकारों और कई वैधानिक अधिकारों का उपभोग भारतीय नागरिकता होने पर निर्भर हैं। जन्म और वंश से नागरिकता दुनिया भर के देश नागरिकता की दो अवधारणाओं का पालन करते हैं: 1-'jus soli' (मिट्टी का अधिकार) या जन्मसिद्ध नागरिकता 2-'jus sanguinis' (रक्त का अधिकार) या वंश द्वारा नागरिकता। पहले मॉडल में, माता-पिता की राष्ट्रीयता की परवाह किए बिना उन सभी को नागरिकता दी जाती है] जो देश की सीमा के भीतर पैदा हुए हैं। दूसरे मॉडल में, जन्म की जगह की परवाह किए बिना, माता-पिता दोनों में से किसी एक या दोनों की राष्ट्रीयता के आधार पर नागरिकता दी जाती है। भारत अपने नागरिकता कानूनों में इन दोनों मॉडलों का उपयोग करता है। संविधान के अनुच्छेद 5 के अनुसार, भारत में रह रहा व्यक्ति भारतीय नागरिक है, यदि: 1- वह भारतीय क्षेत्र में पैदा हुआ है, या 2- उनके माता-पिता में से किसी का जन्म भारतीय क्षेत्र में हुआ हो। तो, जन्म या वंश के साथ जुड़ा अधिव...
क्या मौजूदा वकील से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' लेना है अनिवार्य? जैसा कि हमने समझा है, किसी मुकदमे की कार्यवाही के दौरान पक्षकार अपनी पसंद के वकील को नियुक्त करने, उसकी सेवाओं को समाप्त करने और एक नया वकील नियुक्त करने का पूर्ण अधिकार रखता है। एक पक्षकर को किसी भी समय और किसी भी कारण से अपने वकील को बदलने की स्वतंत्रता है। हालांकि, निष्पक्षता की मांग यह है कि पार्टी को, अपने मौजूदा वकील को पहले से इसे विषय में सूचना देनी चाहिए, हालांकि एक नया वकील नियुक्त करने से पहले की यह अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती है। हालाँकि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया रुल्स के प्रावधानों और विशेष रूप से भाग- VI के अध्याय- II के नियम 39 के अनुसार, एक वकील किसी भी मामले में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करेगा, जिसमें पहले से ही वकालत(नामा) या उपस्थिति दर्ज की गई हो (किसी अन्य वकील द्वारा)। हालाँकि, यदि ऐसे वकील की सहमति प्राप्त की गयी हो तो ऐसा किया जा सकता है। उन मामलों में जहाँ ऐसी सहमति का उत्पादन नहीं होता है, वहां वह वकील यह कहते हुए अदालत में आवेदन करेगा कि उक्त सहमति क्यों प्राप्त नहीं की जा सकती और वह अ...
कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न और महिलाओं के मूल अधिकार – पर २०१३ के अधिनियम को समझने के पहले यह जानना जरूरी है कि कैसे लैंगिक उत्पीड़न सीधे- सीधे महिलाओं के मूल अधिकारों से जुड़ा है. एक उदाहरण लेते है. मान लीजिये एक ऑफिस में एक महिला कर्मचारी पर उसका बॉस या कोई सहकर्मी लगातार अभद्र टिपण्णियां करता है, या जबरदस्ती अपने ऑफिस में बेफिज़ूल बुलाता है, अब ऐसे में शायद वो महिला अपना पूरा मन लगाकर अपने बाकी सहकर्मियों की तरह प्रभावी रूप से कार्य न कर सके, अपनी प्रतिभा का पूरा प्रयोग न कर सके बल्कि वो शायद मानसिक (और कई मामलों में शारीरिक तौर पर भी) तौर पर उस गलत व्यवहार से उबरने की कोशिश में उलझी रहे. ऐसे प्रतिकूल माहौल का जॉब, प्रमोशन सब पर प्रभाव होगा। अत: कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अनुच्छेद १९ में दी गयी व्यावसायिक स्वतंत्रता के अधिकार का और अनुच्छेद १४ में दिए गए बराबरी के अधिकार का हनन है. लैंगिक उत्पीड़न महिलाओं के गरिमा और सुरक्षा के साथ काम करने के हक़ का सीधा-सीधा उल्लंघन है. लैंगिक उत्पीड़न का प्रभाव सिर्फ पीड़ित पर नहीं बल्कि सभी महिला कर्मचारियों पर पड़ सकता है. महिलाओं के लिए ऐसे माहौ...
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