किसी सिविल मामले में वकील कैसे बदला जा सकता है ???

क्या मौजूदा वकील से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' लेना है अनिवार्य?

जैसा कि हमने समझा है, किसी मुकदमे की कार्यवाही के दौरान पक्षकार अपनी पसंद के वकील को नियुक्त करने, उसकी सेवाओं को समाप्त करने और एक नया वकील नियुक्त करने का पूर्ण अधिकार रखता है।

एक पक्षकर को किसी भी समय और किसी भी कारण से अपने वकील को बदलने की स्वतंत्रता है। हालांकि, निष्पक्षता की मांग यह है कि पार्टी को, अपने मौजूदा वकील को पहले से इसे विषय में सूचना देनी चाहिए, हालांकि एक नया वकील नियुक्त करने से पहले की यह अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती है।

हालाँकि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया रुल्स के प्रावधानों और विशेष रूप से भाग- VI के अध्याय- II के नियम 39 के अनुसार, एक वकील किसी भी मामले में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करेगा, जिसमें पहले से ही वकालत(नामा) या उपस्थिति दर्ज की गई हो (किसी अन्य वकील द्वारा)। हालाँकि, यदि ऐसे वकील की सहमति प्राप्त की गयी हो तो ऐसा किया जा सकता है।

उन मामलों में जहाँ ऐसी सहमति का उत्पादन नहीं होता है, वहां वह वकील यह कहते हुए अदालत में आवेदन करेगा कि उक्त सहमति क्यों प्राप्त नहीं की जा सकती और वह अदालत की अनुमति प्राप्त करने के बाद ही मामले में प्रस्तुत हो सकता है।

गौरतलब है कि एक मुवक्किल का सामान्य आचरण यह होना चाहिए है कि यदि वह किसी कारण से अपने वकील को मुक़दमे के दौरान बदलना चाहता है, तो उसे अपने मौजूदा वकील से संपर्क करना चाहिए और ब्रीफ/कागजात वापसी की, एवम 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' की मांग करनी चाहिए।

ऐसा करने से यह उम्मीद बाकी रहती है कि आपसी सहमती से एवं बिना किसी विवाद के सुगमतापूर्वक नए वकील को नियुक्त किया जाता है और अदालत में वक़्त की बर्बादी नहीं होती है - श्री असीम श्यामकेशो सिंह बनाम थोकचोम रंजन मीटी [M.C. (W.P. (C)) No. 147 of 2016 (Ref: - W.P. (C) No. 202 of 2015)]।

यह तय कानून है कि यदि पक्षकार/मुवक्किल का वकील, उसके ब्रीफ/कागजात वापस करता है और 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' देता है (कि दूसरा वकील नियुक्त किये जाने में उसे कोई आपत्ति नहीं है) तो ठीक है और यदि वह ऐसा करने से इनकार करता है, तो पक्षकार/मुवक्किल अपनी शिकायतों के निवारण के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 3 नियम 4 के उपबंधों को लागू कर सकता है और अदालत से संपर्क कर सकता है।

सिविल मामलों में, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत, आदेश 3 नियम 4 के अनुसार, आपके पास अपनी पसंद का वकील नियुक्त करने का अधिकार है, और इस तरह की नियुक्ति तब तक जारी रहती है जब तक कि अदालत इसे मुवक्किल/पक्षकार या वकील के अनुरोध पर समाप्त करने की अनुमति नहीं देती है (जिसके पश्च्यात आवश्यकता के अनुसार वकील बदला जा सकता है)।

आदेश 3 नियम 4 प्लीडर की नियुक्ति

4. प्लीडर की नियुक्ति - (1) कोई भी प्लीडर किसी भी न्यायालय में किसी भी व्यक्ति के लिए कार्य नहीं करेगा जब तक कि वह उस व्यक्ति द्वारा ऐसे लिखित दस्तावेज द्वारा इस प्रयोजन के लिए नियुक्त नहीं किया गया हो जो उस व्यक्ति द्वारा या उसके मान्यताप्राप्त अभिकर्ता द्वारा या ऐसी नियुक्ति करने के लिए मुख्तारनामे द्वारा या उसके अधीन सम्यक रूप से प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति स्वर हस्ताक्षरित है।

(2) हर ऐसी नियुक्ति [न्यायालय में फ़ाइल की जाएगी और उपनियम (1) के प्रयोजनों के लिए] तब तक प्रवृत्त समझी जाएगी जब तक वह न्यायालय की इजाजत से ऐसे लेख द्वारा पर्यवसित न कर दी गयी हो जो, यथास्थिति, मुवक्किल या प्लीडर द्वारा हस्ताक्षरित है और न्यायालय में फ़ाइल कर दिया गया है या जब तक मुवक्किल या प्लीडर की मृत्यु न हो गयी हो या जब तक वाद में उस मुवक्किल से सम्बंधित समस्त कार्यवाहियों का अंत न हो गया हो।

अंत में, इस लेख में हमने देखा कि आमतौर पर वकील को बदलने के लिए मौजूदा अधिवक्ता से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। हालांकि, वकील बदलने का कार्य अदालत की leave (यानी अनुमति) के साथ भी किया जा सकता है, जो आम तौर पर दे दी जाती है (यदि मौजूदा वकील अपनी सहमति देने से इनकार करता है या मुवक्किल की ऐसी मांग की उपेक्षा करता है)।

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