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Showing posts from April, 2019

अपील क्या हैं ??? अपील के कितने प्रकार होते हैं???

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अपील क्या है? यह सर्वविदित है कि अपील क़ानून का एक सुधारात्मक उपाय भर है और अदालत के किसी भी निर्णय या आदेश से अपील का कोई अंतर्निहित अधिकार तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि एक अपील का प्रावधान स्पष्ट रूप से कानून द्वारा प्रदान नहीं किया जाता है। ( दुर्गा शंकर मेहता बनाम रघुराज सिंह मामला) यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि अपील में कानून के साथ फैक्ट्स पर दुबारा अदालत व्यक्ति के मामले को सुनती है, हालाँकि रिवीजन के मामले में ऐसा नहीं होता है। एक सामान्य अर्थ में, अपील पार्टियों को दिया गया एक कानूनी अधिकार है, हालांकि, रिवीजन पूरी तरह से एक आपराधिक अदालत के विवेक पर निर्भर करता है, जिसका अर्थ है कि यह कोई अधिकार के रूप में उपलब्ध नहीं है। ( केरल राज्य बनाम सेबेस्टियन1983 Cri LJ 416 Ker.) अपील के प्रकार क्या क्या हैं? दंड प्रक्रिया संहिता में 4 प्रकार (या परिस्थितियों में) की अपील की बात की गयी है। इन्हे हम एक-एक करके आपको संक्षेप में समझने का प्रयत्न करेंगे। सबसे पहले आइये जानते हैं कि वो तीन प्रकार की अपील क्या हैं? 1 - दोषसिद्धि से अपील (धारा 374 दंड प्रक्रिया संहिता) 2 ...

कैसे दी जा सकती हैं चुनाव परिणाम को चुनौती???

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चुनाव याचिका लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 में चुनाव याचिका के बारे में उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि "कोई भी निर्वाचन इस भाग के प्रावधान के अनुसार उपस्थित की गई निर्वाचन अर्जी द्वारा प्रश्नगत किये जाने के सिवाय प्रश्नगत न किया जाएगा"। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत चुनाव याचिका पर उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय दिया जाता है। चुनाव परिणाम की घोषणा के 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका किसी भी उम्मीदवार या किसी भी निर्वाचक द्वारा एक या एक से अधिक आधार पर प्रस्तुत की जा सकती है। याचिका में क्या-क्या सामग्री होनी चाहिए यह अधिनियम की धारा 83 में वर्णित है। (ए) मुख्य तथ्यों का संक्षिप्त विवरण (ख) याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए भ्रष्ट आचरण के आरोप का पूर्ण विवरण (c) याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर चुनाव को शून्य घोषित करने का आधार (अधिनियम की धारा 100): (a) एक चुनावी उम्मीदवार योग्य नहीं था। (b) किसी भी भ्रष्ट आचरण को उपयोग में लिया गया है (c) किसी भी नामांकन को अनुचित रूप से अस्वीकार कर दिया गया है। (d) चुनाव का परिणाम मुख्य रूप से प्रभावित हुआ है (i) किस...

आचार संहिता क्या है ???

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आचार संहिता क्या है? आचार संहिता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले दिशानिर्देश हैं जिन्हे राजनीतिक दलों की सर्वसम्मति से विकसित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य उन प्रथाओं को रोकने के लिए बनाया गया है जिन्हें आचार संहिता के तहत भ्रष्ट माना जाता है। उदाहरण के लिए, राजनेताओं को द्वेष और घृणा फैलाने वाले भाषण नहीं देने चाहिए या नई परियोजनाओं के बारे में वादे नहीं करना चाहिए जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं। आचार संहिता यह सुनिश्चित करती है कि नागरिकों से किसी तरह का छलावा न किया जाए और सत्तारूढ़ पार्टी सरकारी मशीनरी का प्रयोग अपने पार्टी स्वार्थों के लिए न करें। आचार संहिता निर्देशनों का एक कोड है जिसे निर्वाचन आयोग अपनी कार्यकारी शक्तियों के तहत जारी करता है | आचार संहिता भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) आदि की तरह पूर्णतः कानूनी कोड नहीं है। इसके कई प्रावधानों का उल्लंघन किसी भी दंडात्मक कार्रवाई को आकर्षित नहीं करता है। आचार संहिता राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के मार्गदर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावे...

FIR क्या होती हैं ???

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FIR क्या होती है? FIRST INFORMATION REPORT FIR या प्रथम दृष्टया रिपोर्ट जैसा की नाम से ही स्पष्ट है, अपराध के सम्बन्ध में पुलिस को दी गयी प्रथम सूचना होती है. हर पुलिस थाने में एक रजिस्टर जिसे FIR बुक कहा जाता है, रखी होती है. FIR दायर करने का तात्पर्य है अपराध की सूचना उस बुक में लिखवाना/ रिकॉर्ड करवाना. FIR का उद्देश्य होता है कि अपराध की समुचित पड़ताल और कानूनी कार्यवाही सम्बंधित मशीनरी को प्रारम्भ किया जा सके. कौन FIR दायर करवा सकता है     कौन FIR दायर करवा सकता है? भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार न केवल पीड़ित बल्कि कोई भी व्यक्ति जिसे किसी अपराध के घटित होने की जानकारी हो वह FIR दर्ज़ करवा सकता है. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 39 के तहत कुछ मामलों में हर व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह निम्नलिखित अपराध या उसकी संभावना के सन्दर्भ में पुलिस को सूचित करें- 1. राज्य के विरुद्ध अपराध जैसे- भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना, उसकी तैयारी करना. 2. लोक शान्ति के विरुद्ध अपराध जैसे- unlawful assembly , riot 3. food aduleration , ...

लोक अदालत क्या होती हैं ??? JAVED LL.B

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लोक अदालत का मतलब होता है लोगों की अदालत इसकी संकल्पना हमारे गाँवों में लगने वाली पंचायतों पर आधारित है। इसके अलावा आज के परिवेश में इसके गठन का आधार 1976 का 42वां संविधान संशोधन है, जिसके अंदर अनुच्छेद 39-A में आर्थिक न्याय को जोड़ा गया। लोक अदालत को अमल में लाने के दो मुख्य कारण हैं , पहला यह कि आर्थिक रूप से कमजोर होने कि वज़ह से बहुत सारे लोग न्याय पाने के लिए संसाधन नहीं जुटा पाते। दूसरा अगर वह कोर्ट तक पहुँच भी जाते हैं, तो करोड़ों मुक़दमे लंबित और अपूर्ण होने के कारण उनको समय से न्याय नहीं मिल पाता। हमारे न्यायिक समाज में एक लोकप्रिय सूक्ति है - "न्याय में देरी, अन्याय है" इसका मतलब देर से मिले न्याय की कोई सार्थकता नहीं होती। अब इसी बात को ध्यान में रखते हुये, शासन यह सुनिश्चित करेगा कि देश का कोई भी नागरिक आर्थिक या किसी अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय व न्यायलय से दूर न रह जाए। अपने इसी दायित्व को निभाने के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 पारित किया गया। यह अधिनियम 9 नवंबर, 1995 को लागू हुआ और विधिक सहायता एवं स्थायी लोक अदालतें अस्तित्व में आईं। तो आइये इस ल...